दरअसल औरत जब तक अन्दर से ताकतवर और स्वाभिमानी नहीं है तब तक उसका मानसिक,सामाजिक और आर्थिक विकास न तो संभव है और न ही कोई मायने रखता है।
जब तक वो खुद से प्यार नहीं करेगी, कोई उसे प्यार नहीं देगा। जब तक वो दुनिया को अपने अस्तित्व का एहसास नहीं करवाएगी, तब तक कोई उसकी तरफ नज़र उठाकर नहीं देखेगा।
इसका मतलब ये नहीं कि एक माँ को,एक बहन,बेटी या फिर एक पत्नी को अपने बच्चों, भाई, माँ या पति को निरंतर झकझोरते रहना होगा कि उसके बिना उनके जीवन का कोई मोल नहीं है। उसे तो बस अपने आप में आत्मविश्वास पैदा करके अपने रास्ते पर सम्मानपूर्वक चलते रहना होगा।
मैं ऐसी कई महिलाओं को जानती हूँ जो अपने कार्यस्थल पर अपमानित होती हैं और उस सब से उपेक्षित रहती हैं जो उन्हें मिलना चाहिए। बार बार प्रताड़ना की शिकार होती हैं और फलस्वरूप निराश होती हैं। उनके सामने कई अच्छे विकल्प और प्रस्ताव होते है जिन्हें स्वीकार कर वो उन विषम परिस्थितियों से बाहर निकल सकती हैं।
लेकिन आश्चर्य और अफ़सोस होता है कि वो उन्हीं हालातों में बनी रहना चाहती हैं।घुटती रहती हैं,कलपती और शिकायत करती रहती हैं, लेकिन हिम्मत करके उस दलदल से बाहर नहीं आना चाहतीं।पता नहीं उनमें आत्मविश्वास की कमी है या आत्मसम्मान की कि अनेकों अवसरों का लाभ उठाकर स्वस्थ वातावरण में काम करने के बजाय दमघोटूं स्थान में बनी रहने को ही अपनी किस्मत मानती हैं।
ऐसी महिलाओं की क्या,कैसे और क्यों मदद की जाये जो जीवन के सुगम और सम्मानित रास्ते पर चलने का स्वप्न भी देखने से डरती हैं?क्यों उन्हें सहारे के लिए और रोने के लिए एक कन्धा चाहिए?
