Tuesday, August 23, 2011

अनकहा भाव

अनकहा भाव

पता नहीं क्या चलता है भीतर 
कोई भाव तो है अनकहा 
जिसे शब्द मैं दे नहीं पाती 
अनेकों बार मैंने कविता या गीत कहना चाहा
 पर भीतर के भाव को पढ़ नहीं पाती
 कुछ तो है अवश्य अनगढ़ 
जिसे शब्दों में गढ़ नहीं पाती
 माटी तो है पर सांचा नहीं 
जिससे सुर कलश रच पाती
 क्या लिखूं और क्या गाऊँ 
इसी असमंजस में रह जाती 
विरहिणी की वेदना कहूं
 या पावन प्रेम की अनुभूति
 प्रकृति सौंदर्य को व्यक्त करूं
 या क्षुदित उदरों की अग्नि 
मादक नयनों पर गीत लिखूं
 या वीरों की अमर स्तुति 
काश इस धुंध से निकलकर कुछ रचनात्मक कर पाती