पता नहीं क्या चलता है भीतर
कोई भाव तो है अनकहा
जिसे शब्द मैं दे नहीं पाती
अनेकों बार मैंने कविता या गीत कहना चाहा
पर भीतर के भाव को पढ़ नहीं पाती
कुछ तो है अवश्य अनगढ़
जिसे शब्दों में गढ़ नहीं पाती
माटी तो है पर सांचा नहीं
जिससे सुर कलश रच पाती
क्या लिखूं और क्या गाऊँ
इसी असमंजस में रह जाती
विरहिणी की वेदना कहूं
या पावन प्रेम की अनुभूति
प्रकृति सौंदर्य को व्यक्त करूं
या क्षुदित उदरों की अग्नि
मादक नयनों पर गीत लिखूं
या वीरों की अमर स्तुति
काश इस धुंध से निकलकर
कुछ रचनात्मक कर पाती
