Tuesday, August 23, 2011

अनकहा भाव

अनकहा भाव

पता नहीं क्या चलता है भीतर 
कोई भाव तो है अनकहा 
जिसे शब्द मैं दे नहीं पाती 
अनेकों बार मैंने कविता या गीत कहना चाहा
 पर भीतर के भाव को पढ़ नहीं पाती
 कुछ तो है अवश्य अनगढ़ 
जिसे शब्दों में गढ़ नहीं पाती
 माटी तो है पर सांचा नहीं 
जिससे सुर कलश रच पाती
 क्या लिखूं और क्या गाऊँ 
इसी असमंजस में रह जाती 
विरहिणी की वेदना कहूं
 या पावन प्रेम की अनुभूति
 प्रकृति सौंदर्य को व्यक्त करूं
 या क्षुदित उदरों की अग्नि 
मादक नयनों पर गीत लिखूं
 या वीरों की अमर स्तुति 
काश इस धुंध से निकलकर कुछ रचनात्मक कर पाती


Tuesday, March 8, 2011

महिला सशक्तिकरण

क्या महिला दिवस तभी सार्थक होगा जब हम पुरूषों को अपशब्द कहें? जब हम अपने आप को अबला और लाचार कहें या फिर अपनी किस्मत को रोते रहें? नहीं,बिलकुल नहीं। औरत लाचार और मजबूर नहीं है। सही मायने में औरत शक्ति का स्वरुप है। हम महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं। लेकिन क्या हम औरतें इस शब्द के अर्थ को समझती हैं?
 दरअसल औरत जब तक अन्दर से ताकतवर और स्वाभिमानी नहीं है तब तक उसका मानसिक,सामाजिक और आर्थिक विकास न तो संभव है और न ही कोई मायने रखता है।


 जब तक वो खुद से प्यार नहीं करेगी, कोई उसे प्यार नहीं देगा। जब तक वो दुनिया को अपने अस्तित्व का एहसास नहीं करवाएगी, तब तक कोई उसकी तरफ नज़र उठाकर नहीं देखेगा।
 इसका मतलब ये नहीं कि एक माँ को,एक बहन,बेटी या फिर एक पत्नी को अपने बच्चों, भाई, माँ या पति को निरंतर झकझोरते रहना होगा कि उसके बिना उनके जीवन का कोई मोल नहीं है। उसे तो बस अपने आप में आत्मविश्वास पैदा करके अपने रास्ते पर सम्मानपूर्वक चलते रहना होगा।
 मैं ऐसी कई महिलाओं को जानती हूँ जो अपने कार्यस्थल पर अपमानित होती हैं और उस सब से उपेक्षित रहती हैं जो उन्हें मिलना चाहिए। बार बार प्रताड़ना की शिकार होती हैं और फलस्वरूप निराश होती हैं। उनके सामने कई अच्छे विकल्प और प्रस्ताव होते है जिन्हें स्वीकार कर वो उन विषम परिस्थितियों से बाहर निकल सकती हैं। लेकिन आश्चर्य और अफ़सोस होता है कि वो उन्हीं हालातों में बनी रहना चाहती हैं।घुटती रहती हैं,कलपती और शिकायत करती रहती हैं, लेकिन हिम्मत करके उस दलदल से बाहर नहीं आना चाहतीं।पता नहीं उनमें आत्मविश्वास की कमी है या आत्मसम्मान की कि अनेकों अवसरों का लाभ उठाकर स्वस्थ वातावरण में काम करने के बजाय दमघोटूं स्थान में बनी रहने को ही अपनी किस्मत मानती हैं। ऐसी महिलाओं की क्या,कैसे और क्यों मदद की जाये जो जीवन के सुगम और सम्मानित रास्ते पर चलने का स्वप्न भी देखने से डरती हैं?क्यों उन्हें सहारे के लिए और रोने के लिए एक कन्धा चाहिए?

Monday, February 21, 2011

पिया के घर चली

प्रिय बहन क्षिप्रा को

आज प्रतीक्षा पूर्ण होगी और तुम्हारे प्रियवर आयेंगे,
 मेरे ह्रदय के टुकड़े को संग अपने ले जायेंगे। 
सोलह-श्रृंगार से सजी और प्रेम लालिमा से दमकती, 
प्रिय के नाम की मेहंदी सजाये,
हाथ में वरमाला लिए, 
सुन्दरतम मेरी प्यारी बहन को किसी की नज़र न लगे। 
बाबुल का अंगना छोड़ के नया संसार बसाने चली, 
महकाए पिया का घर,आँगन ,गली-गली।
मैं कवियत्री जो नहीं जो सुन्दर कविता लिख पाती,
हृदय से निकले भावों को उत्कृष्ट रूप दे पाती।
 आड़े-तिरछे शब्दों में प्रेम सुधा बरसाती हूँ,
ओ मेरी प्रिया तुम्हें असीमित आशीर्वाद देती हूँ।



Sunday, February 6, 2011

मृगतृष्णा

क्या है अंतिम सत्य यात्रा या फिर गंतव्य? क्या तीर्थ का कोई मूल्य नहीं,
केवल तीर्थयात्रा ही सार्थक है?
क्या मोक्ष का कोई अर्थ नहीं
केवल प्रयास ही पर्याप्त है?
विचित्र द्वंद्व है पथिक के लिए
यात्रा आरम्भ करने से पहले ही हुआ जाता सशंकित है| 
क्या वह सिसीफस की अभिशप्त प्रेतात्मा है 
जो कभी अपना लक्ष्य न पा सकेगा? छटपटाता रहेगा जीवन पर्यंत? 
फिर भी निरंतर प्रयासरत रहेगा उस विराट विशाल को छू पाने के लिए 
कहीं उसे निराशा घेर तो न लेगी कि वह व्यर्थ ही प्रयासरत है? 
यह कैसी मृगतृष्णा है रे पथिक 
जो आगे बढ़ते जाने के लिए लालसा जगाती रहती है?


Wednesday, February 2, 2011

जन्मदिन

धन्यवाद् उन सभी लोगों का जिन्होंने आज मेरा जन्मदिन याद रखा और मुझे शुभकामनाएं दी।वैसे तो मित्रता और किसी भी रिश्ते को किसी खास दिन की आस नहीं रहती,पर फिर भी जब कोई रिश्तेदार या दोस्त आपका जन्मदिन याद रखता है तो खुद को खास होने का सुखद एहसास होता है।ऐसा लगता है कि आप किसी के लिए विशेष हैं और वो आपके जीवन से जुड़े46 पहलूओं को महत्त्व देते हैं। अपनों की शुभकामनाओं का जीवन में सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।यह एक दिन पूरे साल भर को तरोताज़ा कर देता है और संबंधों की गांठ को और मज़बूत बना देता है।एक बार फिर से शुक्रिया कि आप सब ने मुझे याद रखा।


Sunday, January 30, 2011

कर्मठ पथिक

जीवन पथ था बड़ा दुष्कर 
कांटे थे जहाँ पग-पग पर
 दमन चक्र की अग्नि में 
स्वर्ण बने वे तप-तप कर 
पावन रक्त की गंगा से 
मातृभूमि को सिंचित कर 
राष्ट्र ध्वज की आन पर 
शीश चढ़ाने को तत्पर 
स्वतंत्रता के महायज्ञ में 
जीवन होम किया विहंसकर
 धन्य धन्य तुम कर्मठ पथिक 
निस्वार्थ आहुति देकर 
शत शत नमन करें हम 
है गर्वित यह राष्ट्र तुम पर