Thursday, May 14, 2020

हर में हर है

न मैं जानूँ जप तप न मैं जानूँ ध्यान
न मैं जानूँ पूजा न ही विधि विधान
न मैं साधूँ आसन न बूझूँ पुराण
मैं तो बस अर्पण कर सकूँ प्रण औ प्राण
जो तेरी मर्ज़ी जो तेरी लीला वो तो तू ही जान
मैं हूँ तुझमें तू है मुझमें इसका दे दे ज्ञान




मज़दूर की आस

"आकाश में उड़ने वाले पंछी को भी अपने घर की याद आती है।"
~मुंशी प्रेमचंद

लौट रहे हैं मज़दूर होकर मजबूर
न घर है और न है रोज़गार
न कोई आस है और न है कोई खास
जिस नगर को बसाया
उसी ने कर दिया पराया
न रोटी है न पानी है
बस घर जाने की ठानी है
हज़ारों मीलों का सफ़र है
मुश्किल भरी डगर है
पैदल ही है चलते जाना
न जाने आए न आए ठिकाना
घर की छत मिल जाए
तो उसमें सिमट जाएँ
अपनों का साथ मिल जाए
तो जीवन जाने की आस मिल जाए





अनहद नाद

जब हमारे भीतर बहुत शोर होता है तो उसे दबाने के लिए हम बाहर शोर पैदा कर लेते हैं। ज़ोर ज़ोर से चिल्ला कर बोलना या ऊँची आवाज़ में टीवी,टेप रिकॉर्डर या लाउड स्पीकर चलाना इस बात को साबित करता है कि हम अपने अंदर के शोर को दबाना चाहते हैं।


हमारे भीतर एक आवाज़ है- अनहद नाद,हमारी आत्मा की आवाज़। इसे अगर सुनना है तो मौन में जाना होगा,बाहर के शोर से दूर। तभी हम उस आवाज़ को सुन पाएँगे। एकांत और मौन में अपने आप को ढूँढ पाएँगे हम।