जब हमारे भीतर बहुत शोर होता है तो उसे दबाने के लिए हम बाहर शोर पैदा कर लेते हैं। ज़ोर ज़ोर से चिल्ला कर बोलना या ऊँची आवाज़ में टीवी,टेप रिकॉर्डर या लाउड स्पीकर चलाना इस बात को साबित करता है कि हम अपने अंदर के शोर को दबाना चाहते हैं।
हमारे भीतर एक आवाज़ है- अनहद नाद,हमारी आत्मा की आवाज़। इसे अगर सुनना है तो मौन में जाना होगा,बाहर के शोर से दूर। तभी हम उस आवाज़ को सुन पाएँगे। एकांत और मौन में अपने आप को ढूँढ पाएँगे हम।
हमारे भीतर एक आवाज़ है- अनहद नाद,हमारी आत्मा की आवाज़। इसे अगर सुनना है तो मौन में जाना होगा,बाहर के शोर से दूर। तभी हम उस आवाज़ को सुन पाएँगे। एकांत और मौन में अपने आप को ढूँढ पाएँगे हम।


No comments:
Post a Comment