तो फिर ठीक है समेट लेती हूँ अपने आप को
अपने ही भीतर हो लेती हूँ
आस तो थी कि बाहर-भीतर एक कर लूँ
जब कुछ नहीं हूँ तो क्यों न कुछ नहीं ही हो जाऊँ
साधारण हूँ और इसका कोई अफ़सोस भी नहीं मुझे
अब शून्य होने की ओर चल पड़ती हूँ
नितान्त मौन में अकेली मैं
अपने ही भीतर हो लेती हूँ
आस तो थी कि बाहर-भीतर एक कर लूँ
जब कुछ नहीं हूँ तो क्यों न कुछ नहीं ही हो जाऊँ
साधारण हूँ और इसका कोई अफ़सोस भी नहीं मुझे
अब शून्य होने की ओर चल पड़ती हूँ
नितान्त मौन में अकेली मैं

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