"आकाश में उड़ने वाले पंछी को भी अपने घर की याद आती है।"
~मुंशी प्रेमचंद
लौट रहे हैं मज़दूर होकर मजबूर
न घर है और न है रोज़गार
न कोई आस है और न है कोई खास
जिस नगर को बसाया
उसी ने कर दिया पराया
न रोटी है न पानी है
बस घर जाने की ठानी है
हज़ारों मीलों का सफ़र है
मुश्किल भरी डगर है
पैदल ही है चलते जाना
न जाने आए न आए ठिकाना
घर की छत मिल जाए
तो उसमें सिमट जाएँ
अपनों का साथ मिल जाए
तो जीवन जाने की आस मिल जाए
~मुंशी प्रेमचंद
लौट रहे हैं मज़दूर होकर मजबूर
न घर है और न है रोज़गार
न कोई आस है और न है कोई खास
जिस नगर को बसाया
उसी ने कर दिया पराया
न रोटी है न पानी है
बस घर जाने की ठानी है
हज़ारों मीलों का सफ़र है
मुश्किल भरी डगर है
पैदल ही है चलते जाना
न जाने आए न आए ठिकाना
घर की छत मिल जाए
तो उसमें सिमट जाएँ
अपनों का साथ मिल जाए
तो जीवन जाने की आस मिल जाए

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