क्या है अंतिम सत्य
यात्रा या फिर गंतव्य?
क्या तीर्थ का कोई मूल्य नहीं,
केवल तीर्थयात्रा ही सार्थक है?
क्या मोक्ष का कोई अर्थ नहीं
केवल प्रयास ही पर्याप्त है?
विचित्र द्वंद्व है पथिक के लिए
यात्रा आरम्भ करने से पहले ही
हुआ जाता सशंकित है|
क्या वह सिसीफस की अभिशप्त प्रेतात्मा है
जो कभी अपना लक्ष्य न पा सकेगा?
छटपटाता रहेगा जीवन पर्यंत?
फिर भी निरंतर प्रयासरत रहेगा
उस विराट विशाल को छू पाने के लिए
कहीं उसे निराशा घेर तो न लेगी
कि वह व्यर्थ ही प्रयासरत है?
यह कैसी मृगतृष्णा है रे पथिक
जो आगे बढ़ते जाने के लिए
लालसा जगाती रहती है?

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