कांटे थे जहाँ पग-पग पर
दमन चक्र की अग्नि में
स्वर्ण बने वे तप-तप कर
पावन रक्त की गंगा से
मातृभूमि को सिंचित कर
राष्ट्र ध्वज की आन पर
शीश चढ़ाने को तत्पर
स्वतंत्रता के महायज्ञ में
जीवन होम किया विहंसकर
धन्य धन्य तुम कर्मठ पथिक
निस्वार्थ आहुति देकर
शत शत नमन करें हम
है गर्वित यह राष्ट्र तुम पर

I really enjoyed reading the posts on your blog.
ReplyDeleteआप अपने ब्लाग की सेटिंग मे(कमेंट ) शब्द पुष्टिकरण ।
ReplyDeleteword veryfication पर नो no पर
टिक लगाकर सेटिंग को सेव कर दें । टिप्प्णी
देने में झन्झट होता है ।
good lavanya,
ReplyDeletekeep it up..
sahi kha ....
दमन चक्र की अग्नि में
स्वर्ण बने वे तप-तप कर